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Rajasthani Poem against Holi porn language tradition

गीत—गाळ सैंग आछा—माड़ा,
है संस्कृति नैं पोखणिया।

रीत जबकै फिटा बोले,
अै लाज—सरम नैं बेचणिया।।

भरयै बजार सांथळ उघाड़ै,
मन में मौद मनावणिया।

स्याणा कानां आंगळी धरे,
हांसी उडावे मसखरिया।

बूंटी री बरक लेय बरकै,
अै च़ौड़े—धाड़ै गावणिया।।

बहु—बारयां ओला लेवे,
करे ताका—ताकी लुतरिया।

कींकर लूकै खोटी निजरां,
अेक पोळ में रैवणिया।।

- विनोद सारस्वत, बीकानेर

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