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poems> Mother

ये माँ है मियाँ इसका तो गुस्सा मुस्कुराता है

Beautiful poem on Mother by Munnavvar Rana

कदम जब चूम ले मंज़िल तो जज़्बा मुस्कुराता है
दुआ लेकर चलो माँ की तो रस्ता मुस्कुराता है

किया नाराज़ माँ को और बच्चा हँस के ये बोला
के ये माँ है मियाँ इसका तो गुस्सा मुस्कुराता है

किताबों से निकलकर तितलियाँ ग़ज़लेँ सुनाती हैँ
टिफिन रखती है मेरी माँ तो बस्ता मुस्कुराता है

सभी रिश्ते यहाँ बर्बाद हैँ मतलब परस्ती से
मगर सदियों से माँ-बेटे का रिश्ता मुस्कुराता है।

सुबह उठते ही जब मैँ चूमता हूँ माँ की आँखों को
ख़ुदा के साथ उसका हर फरिश्ता मुस्कुराता है

मेरी माँ के बिना मेरी सभी ग़ज़लेँ अधूरी हैँ
अगर माँ लफ़्ज़ शामिल हो तो किस्सा मुस्कुराता है

वो उजला हो के मैला हो या मँहगा हो के सस्ता हो
ये माँ का सर है इस पे हर दुपट्टा मुस्कुराता है

फरिश्तों ने कहा आमाल का संदूक क्या खोलेँ
दुआ लाया है माँ की, इसका बक्सा मुस्कुराता है।


"मुनव्वर राना" साहब

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