put the Glass Down

A Psychologist walked around a room while
teaching Stress Management to an audience.

As she raised a glass of water, everyone expected they'd be asked
the "Half empty or Half full" question.

Instead, with a smile on her face, she inquired:
"How heavy is this glass of water?"

Answers called out ranged from 8 oz. to 20 oz.

She replied, 
"The absolute weight doesn't matter.
It depends on how long I hold it.

If I hold it for a minute, it's not a problem.

If I hold it for an hour, I'll have an ache in my arm.

If I hold it for a day, my arm will feel numb and paralyzed.

In each case, the weight of the glass doesn't change,

But

The longer I hold it, the heavier it becomes.
She continued, "The Stresses and Worries in Life , are like that Glass of Water...

Think about them for a while and nothing happens.

Think about them a bit longer and they begin to hurt.

And

If you think about them all day long, you will feel paralysed – incapable of doing anything."

Remember to put the Glass DownRead Details

आहार और आश्रय को ही परम गति मानते

नदी में हाथी की लाश बही जा रही थी। एक कौए ने लाश देखी, तो प्रसन्न हो उठा, तुरंत उस पर आ बैठा। यथेष्ट मांस खाया। नदी का जल पिया। उस लाश पर इधर-उधर फुदकते हुए कौए ने परम तृप्ति की डकार ली। वह सोचने लगा, अहा! यह तो अत्यंत सुंदर यान है, यहां भोजन और जल की भी कमी नहीं। फिर इसे छोड़कर अन्यत्र क्यों भटकता फिरूं?
कौआ नदी के साथ बहने वाली उस लाश के ऊपर कई दिनों तक रमता रहा। भूख लगने पर वह लाश को नोचकर खा लेता, प्यास लगने पर नदी का पानी पी लेता। अगाध जलराशि, उसका तेज प्रवाह, किनारे पर दूर-दूर तक फैले प्रकृति के मनोहरी दृश्य-इन्हें देख-देखकर वह विभोर होता रहा।
नदी एक दिन आखिर महासागर में मिली। वह मुदित थी कि उसे अपना गंतव्य प्राप्त हुआ। सागर से मिलना ही उसका चरम लक्ष्य था, किंतु उस दिन लक्ष्यहीन कौए की तो बड़ी दुर्गति हो गई। चार दिन की मौज-मस्ती ने उसे ऐसी जगह ला पटका था, जहां उसके लिए न भोजन था, न पेयजल और न ही कोई आश्रय। सब ओर सीमाहीन अनंत खारी जल-राशि तरंगायित हो रही थी।
कौआ थका-हारा और भूखा-प्यासा कुछ दिन तक तो चारों दिशाओं में पंख फटकारता रहा, अपनी छिछली और टेढ़ी-मेढ़ी उड़ानों से झूठा रौब फैलाता रहा, किंतु महासागर का ओर-छोर उसे कहीं नजर नहीं आया। आखिरकार थककर, दुख से कातर होकर वह सागर की उन्हीं गगनचुंबी लहरों में गिर गया। एक विशाल मगरमच्छ उसे निगल गया।
शारीरिक सुख में लिप्त मनुष्यों की भी गति उसी कौए की तरह होती है, जो आहार और आश्रय को ही परम गति मानते हैं और अंत में अनन्त संसार रूपी सागर में समा जाते है।Read Details

मछुवारे क्या करते

Excellent Motivational Story...

जापान में हमेशा से ही मछलियाँ खाने का एक ज़रुरी हिस्सा रही हैं । और ये जितनी ताज़ी होतीं हैँ लोग उसे उतना ही पसंद करते हैं । लेकिन जापान के तटों के आस-पास इतनी मछलियाँ नहीं होतीं की उनसे लोगोँ की डिमांड पूरी की जा सके । नतीजतन मछुआरों को दूर समुंद्र में जाकर मछलियाँ पकड़नी पड़ती हैं।जब इस तरह से मछलियाँ पकड़ने की शुरुआत हुई तो मछुआरों के  सामने एक गंभीर समस्या सामने आई ।  वे जितनी दूर मछली पक़डने जाते उन्हें लौटने मे उतना ही अधिक समय लगता और मछलियाँ बाजार तक पहुँचते-पहुँचते बासी हो जातीँ , ओर फिर कोई उन्हें खरीदना नहीं चाहता ।इस समस्या से निपटने के लिए मछुआरों ने अपनी बोट्स पर फ्रीज़र लगवा लिये । वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें फ्रीजर में डाल देते ।
इस तरह से वे और भी देर तक मछलियाँ पकड़ सकते थे और उसे बाजार तक पहुंचा सकते थे । पर इसमें भी एक समस्या आ गयी । जापानी फ्रोजेन फ़िश ओर फ्रेश फिश में आसनी से अंतर कर लेते और फ्रोजेन मछलियों को खरीदने से कतराते , उन्हें तो किसी भी कीमत पर ताज़ी मछलियाँ ही चाहिए होतीं ।एक बार फिर मछुआरों ने इस समस्या से निपटने की सोची और इस बार एक शानदार तरीका निकाला, .उन्होंने अपनी बड़ी – बड़ी जहाजों पर फ़िश टैंक्स बनवा लिए ओर अब वे मछलियाँ पकड़ते और उन्हें पानी से भरे टैंकों मे डाल देते ।
टैंक में डालने के बाद कुछ देर तो मछलियाँ इधर उधर भागती पर जगह कम होने के कारण वे जल्द ही एक जगह स्थिर हो जातीं ,और जब ये मछलियाँ
बाजार पहुँचती तो भले वे ही सांस ले रही होतीं लकिन उनमेँ वो बात नहीं होती जो आज़ाद घूम रही ताज़ी मछलियों मे होती , ओर जापानी चखकर इन मछलियों में भी अंतर कर लेते ।
तो इतना कुछ करने के बाद भी समस्या जस की तस बनी हुई थी।अब मछुवारे क्या करते ? वे कौन सा उपाय लगाते कि ताज़ी मछलियाँ लोगोँ तक पहुँच पाती ?
नहीं, उन्होंने कुछ नया नहीं किया , वें अभी भी मछलियाँ टैंक्स में ही रखते , पर इस बार वो हर एक टैंक मे एक छोटी सी शार्क
मछली भी ङाल देते। 
शार्क कुछ मछलियों को जरूर खा जाती पर ज्यादातर मछलियाँ बिलकुल ताज़ी पहुंचती।ऐसा क्यों होता ? क्योंकि शार्क बाकी मछलियों की लिए एक चैलेंज की तरह थी। उसकी मौज़ूदगी बाक़ी मछलियों को हमेशा चौकन्ना रखती ओर अपनी जान बचाने के लिए वे हमेशा अलर्ट रहती। इसीलिए कई दिनों तक टैंक में रह्ने के बावज़ूद उनमे स्फूर्ति ओर ताजापन बना रहता।
आज बहुत से लोगों की ज़िन्दगी टैंक मे पड़ी उन मछलियों की तरह हो गयी है जिन्हे जगाने की लिए कोई shark मौज़ूद नहीं है। और अगर unfortunately आपके साथ भी ऐसा ही है तो आपको भी आपने life में नये challenges accept करने होंगे।
आप जिस रूटीन के आदि हों चुकें हैँ ऊससे कुछ अलग़ करना होगा, आपको अपना दायरा बढ़ाना होगा और एक बार फिर ज़िन्दगी में रोमांच और नयापन लाना होगा। 
नहीं तो , बासी मछलियों की तरह आपका भी मोल कम हों जायेगा और लोग आपसे मिलने-जुलने की बजाय बचते नजर आएंगे। और दूसरी तरफ अगर आपकी लाइफ में चैलेंजेज हैँ , बाधाएं हैँ तो उन्हें कोसते मत रहिये , कहीं ना कहीं ये आपको fresh and lively बनाये रखती हैँ , इन्हेँ accept करिये, इन्हे overcome करिये और अपना तेज बनाये रखिये।Read Details

ऐसा भेदभाव क्यों

एक ट्रक में मारबल का सामान जा रहा था,  उसमे टाईल्स भी थी, और भगवान की मूर्ति भी थी..!!

रास्ते में टाईल्स ने मूर्ति से पूछा- भाई ऊपर वाले ने हमारे साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया है..!!

मूर्ति ने पूछा- कैसा भेदभाव???

टाईल्स ने कहा- तुम भी पत्थर, मै भी पत्थर ..!!
तुम भी उसी खान से निकले, मै भी..
तुम्हे भी उसी ने ख़रीदा और बेचा, मुझे भी।।
तुम भी मन्दिर में जाओगे, मै भी...
पर वहां तुम्हारी पूजा होगी...
और मै पैरो तले रौंदा जाउंगा, ऐसा क्यों??

मूर्ती ने बड़ी शालीनता से जवाब दिया- तुम्हे जब तराशा गया, तब तुमसे दर्द सहन नही हुवा, और तुम टूट गये, टुकड़ो में बंट गये...
और मुझे जब तराशा गया तब मैने दर्द सहा, मुझ पर लाखो हथोड़े बरसाये गये, पर मै रोया नही...!!

मेरी आँख बनी, कान बने, हाथ बना, पांव बने..
फिर भी मैं टूटा नही....!!

इस तरहा मेरा रूप निखर गया...
और मै पूजनीय हो गया ... !!

तुम भी दर्द सहते तो तुम भी पूजे जाते.. मगर तुम टूट गए... और टूटने वाले हमेशा पैरों तले रोंदे जाते है...!!Read Details